रायगढ़ का नटवर स्कूल मैदान: बच्चों का खेल मैदान बनता व्यावसायिक अड्डा…

रायगढ़।शहर के बीचों-बीच स्थित नटवर स्कूल का मैदान दशकों से शहर के बच्चों की पहचान रहा है। सुबह-शाम यहां क्रिकेट, फुटबॉल, कबड्डी खेलते बच्चों की भीड़ और अभिभावकों की चहल-पहल ही इसकी असली रौनक थी। लेकिन पिछले कुछ सालों में इस मैदान की तस्वीर बदल रही है। अब सवाल उठ रहा है – क्या ये मैदान बच्चों के लिए बचा है या पूरी तरह व्यावसायिक गतिविधियों का अड्डा बन चुका है?

1. मैदान का पुराना स्वरूप: शहर की खुली सांस…
नटवर स्कूल का मैदान रायगढ़ के गिने-चुने बड़े खुले मैदानों में से एक है। शहर के मध्य में होने के कारण हर वार्ड के बच्चे यहां आसानी से पहुंच जाते थे। स्कूल की पीटी, खेल प्रतियोगिता, वार्षिक उत्सव से लेकर मोहल्ले के बच्चों के रोज के खेल तक – सब कुछ यहीं होता था। ये सिर्फ स्कूल का नहीं, पूरे शहर का ‘सामुदायिक मैदान’ था।
2. व्यावसायिक इस्तेमाल कैसे बढ़ा?…
शहर का विस्तार हुआ, पर नए खेल मैदान नहीं बने। उल्टा पुराने मैदान बिल्डिंगों और दुकानों में बदल गए। नतीजा ये हुआ कि बचे-खुचे मैदानों पर दबाव बढ़ गया। नटवर स्कूल मैदान भी इससे अछूता नहीं रहा।
व्यावसायिक गतिविधियां जो लगातार बढ़ीं:…
- अस्थायी बाजार और मेले: त्योहारी सीजन में बाजार, हस्तशिल्प मेले और एक-दिवसीय अस्थायी बाजार यहां नियमित रूप से लगने लगे हैं। पिछले साल की तुलना में दुकानदारों और खरीदारों दोनों की संख्या बढ़ी है।
- प्रदर्शनी और स्टॉल: सरकारी योजनाओं की प्रदर्शनी, निजी कंपनियों के प्रमोशनल स्टॉल और बिक्री कैंप के लिए मैदान का इस्तेमाल आम हो गया है।
समस्या ‘एक-दो दिन’ के आयोजन से नहीं है। समस्या ये है कि ‘अस्थायी’ के नाम पर होने वाले ये आयोजन अब इतने बार-बार हो रहे हैं कि मैदान साल के कई महीने बच्चों के लिए बंद रहता है।
3. बच्चों को लेकर अभिभावकों की बड़ी चिंताए…
- खेल की जगह खत्म: रोज प्रैक्टिस करने वाले बच्चों को अब हफ्तों इंतजार करना पड़ता है। मैदान पर टेंट, स्टेज या दुकानें लगी होती हैं। शहर में विकल्प नहीं है, इसलिए खेल छूट रहा है।
- अतिक्रमण की आशंका: रायगढ़ का अनुभव बताता है कि कई मैदान पहले ‘अस्थायी दुकानों’ से शुरू हुए और धीरे-धीरे पक्के निर्माण में बदल गए। नटवर मैदान को लेकर भी यही डर है कि कहीं ये भी ‘सुनियोजित तरीके’ से व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स न बन जाए।
- प्राथमिकता का सवाल: जब मैदान पर बाजार लगता है तो विभाग को किराया मिलता है। लेकिन इसकी कीमत बच्चों का शारीरिक विकास और बचपन चुका रहा है। शहर को तय करना होगा कि उसकी प्राथमिकता राजस्व है या अगली पीढ़ी का स्वास्थ्य?
4. प्रशासनिक पक्ष क्या है?….
नटवर मैदान तकनीकी रूप से स्कूल शिक्षा विभाग की संपत्ति है। स्कूल प्रबंधन और जिला प्रशासन की अनुमति से ही यहां आयोजन होते हैं। तर्क ये दिया जाता है कि शहर के बीच में इतनी बड़ी खुली जगह और कहीं नहीं है, इसलिए बड़े आयोजनों के लिए मजबूरी में इसका इस्तेमाल होता है।
5. समाधान के लिए 4 व्यावहारिक सुझाव….
अगर मैदान को बचाना है तो सिर्फ विरोध से काम नहीं चलेगा। ठोस कदम उठाने होंगे:
- ‘खेल क्षेत्र आरक्षित’ नीति: मैदान का 70% हिस्सा सिर्फ खेल के लिए आरक्षित किया जाए। व्यावसायिक आयोजन के लिए कोने में एक छोटा हिस्सा तय हो, और वो भी साल में अधिकतम 15 दिन के लिए।
- वैकल्पिक व्यावसायिक स्थल: नगर निगम शहर में एक-दो जगह ‘एग्जीबिशन ग्राउंड’ या ‘हाट बाजार’ के रूप में विकसित करे। सारे मेले, प्रदर्शनी, बाजार वहीं शिफ्ट हों। नटवर मैदान पर भार कम होगा।
- समय का बंटवारा: सुबह 6 से 9 और शाम 4 से 7 बजे तक का समय ‘अनिवार्य खेल समय’ घोषित हो। इस दौरान मैदान पर कोई स्टॉल, टेंट या व्यावसायिक गतिविधि न हो।
निष्कर्ष: राजस्व बनाम बचपन….
नटवर स्कूल का मैदान सिर्फ खाली जमीन का टुकड़ा नहीं है। वो रायगढ़ के हजारों बच्चों का बचपन है, उनकी सेहत है, उनका भविष्य है। शहर को विकास और राजस्व दोनों चाहिए, लेकिन उसकी कीमत बच्चों का खेल मैदान नहीं हो सकती।
‘अस्थायी बाजार’ अगर नियम और नियंत्रण के बिना लगते रहे, तो वो बहुत जल्दी ‘स्थायी अतिक्रमण’ बन जाते हैं। रायगढ़ के पास अभी भी वक्त है। नटवर मैदान को पूरी तरह व्यावसायिक अड्डा बनने से रोकना है तो नागरिकों, अभिभावकों और प्रशासन को मिलकर अभी फैसला लेना होगा।
वरना आने वाली पीढ़ी पूछेगी – हमारे खेलने की जगह का सौदा कितने में हुआ था?




